Assembly Elections Approaching In Punjab, Politics Has Started Weighing Heavily On Farmers’ Agitation  – पंजाब विधानसभा चुनाव: किसान आंदोलन की धमक पर भारी पड़ने लगी सियासत, धीरे-धीरे कोर दलों के करीब आने लगे किसान 

सुशील कुमार, संवाद न्यूज एजेंसी, सुनाम ऊधम सिंह वाला (पंजाब)
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Mon, 07 Feb 2022 05:29 PM IST

सार

किसान आंदोलन के बाद वजूद में आए संयुक्त समाज मोर्चा की सियासी जद्दोजहद जारी है। मोर्चा के प्रत्याशियों की नजर किसानों पर है, किंतु किसानों का रुख देखकर मोर्चा के नेता हैरत में हैं। किसानों का पुराने राजनीतिक परिवेश में लौटना, मोर्चा के लिए किसी झटके से कम नहीं है।

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पंजाब में विधानसभा चुनाव के नजदीक आते ही किसान आंदोलन की धमक पर सियासत भारी पड़ने लगी है। खास तौर पर मालवा के ग्रामीण क्षेत्रों में हो रही सियासी हलचल इसके स्पष्ट संकेत दे रही है। गांवों में सियासी दलों के होने वाले सीमित समागम में आम किसानों की शमूलियत देखी जा सकती है। मौजूदा सियासी सिस्टम के विरोध में भारतीय किसान यूनियन एकता उगराहां की जागरूक मुहिम वोटां ने नीं लाना पार, लड़ना पैना बन्न कतार’ जारी है। यूनियन गांवों में रैलियां करके किसानों से संघर्ष करने की अपील कर रही है। किसानों को एकजुट रहने और नेताओं से भले की उम्मीद नहीं रखने का आह्वान किया जा रहा है।

इतना ही नहीं आम किसान, नौजवान व महिलाएं, राजनीतिक समागम में सियासी दलों के हक में नारेबाजी करते देखे जा सकते हैं। हालांकि किसान जत्थेबंदियों से सीधे तौर पर जुडे़ किसान, सियासी गतिविधियों से दूर हैं। लेकिन किसान धीरे-धीरे अपने कोर सियासी दलों के करीब आने लगे हैं। जानकार मान रहे हैं कि कई किसान जत्थेबंदियों का प्रभाव कायम है लेकिन सियासी पारा चढ़ते ही आम किसान, आंदोलन के प्रभाव से बाहर आने लगे हैं। किसानों के इस रुख से सियासी दलों ने भी राहत की सांस ली है। क्योंकि इससे नेताओं के विरोध का सिलसिला थम गया है। नेता अपनी गतिविधियों को जारी रखने में सफल हो रहे हैं। जबकि इससे पहले आए दिन गांवों में नेताओं का विरोध होता था। 

संयुक्त समाज मोर्चा की जद्दोजहद जारी

किसान आंदोलन के बाद वजूद में आए संयुक्त समाज मोर्चा की सियासी जद्दोजहद जारी है। मोर्चा के प्रत्याशियों की नजर किसानों पर है, किंतु किसानों का रुख देखकर मोर्चा के नेता हैरत में हैं। किसानों का पुराने राजनीतिक परिवेश में लौटना, मोर्चा के लिए किसी झटके से कम नहीं है। मोर्चा को आस है कि मालवा में किसान वोट बैंक उनके साथ जुडे़गा, लेकिन भाकियू उगराहां की जागरूक मुहिम का असर मोर्चा की आस पर ग्रहण लगाता प्रतीत हो रहा है। भारतीय किसान यूनियन एकता उगराहां के महासचिव दरबारा सिंह छाजला ने कहा कि आंदोलन के जरिये ही अधिकारों को हासिल किया जा सकता है। सियासी दलों ने तो किसानी की आड़ में सियासत की है और इसी वजह से किसान घोर संकट में हैं।

विस्तार

पंजाब में विधानसभा चुनाव के नजदीक आते ही किसान आंदोलन की धमक पर सियासत भारी पड़ने लगी है। खास तौर पर मालवा के ग्रामीण क्षेत्रों में हो रही सियासी हलचल इसके स्पष्ट संकेत दे रही है। गांवों में सियासी दलों के होने वाले सीमित समागम में आम किसानों की शमूलियत देखी जा सकती है। मौजूदा सियासी सिस्टम के विरोध में भारतीय किसान यूनियन एकता उगराहां की जागरूक मुहिम वोटां ने नीं लाना पार, लड़ना पैना बन्न कतार’ जारी है। यूनियन गांवों में रैलियां करके किसानों से संघर्ष करने की अपील कर रही है। किसानों को एकजुट रहने और नेताओं से भले की उम्मीद नहीं रखने का आह्वान किया जा रहा है।

इतना ही नहीं आम किसान, नौजवान व महिलाएं, राजनीतिक समागम में सियासी दलों के हक में नारेबाजी करते देखे जा सकते हैं। हालांकि किसान जत्थेबंदियों से सीधे तौर पर जुडे़ किसान, सियासी गतिविधियों से दूर हैं। लेकिन किसान धीरे-धीरे अपने कोर सियासी दलों के करीब आने लगे हैं। जानकार मान रहे हैं कि कई किसान जत्थेबंदियों का प्रभाव कायम है लेकिन सियासी पारा चढ़ते ही आम किसान, आंदोलन के प्रभाव से बाहर आने लगे हैं। किसानों के इस रुख से सियासी दलों ने भी राहत की सांस ली है। क्योंकि इससे नेताओं के विरोध का सिलसिला थम गया है। नेता अपनी गतिविधियों को जारी रखने में सफल हो रहे हैं। जबकि इससे पहले आए दिन गांवों में नेताओं का विरोध होता था। 

संयुक्त समाज मोर्चा की जद्दोजहद जारी

किसान आंदोलन के बाद वजूद में आए संयुक्त समाज मोर्चा की सियासी जद्दोजहद जारी है। मोर्चा के प्रत्याशियों की नजर किसानों पर है, किंतु किसानों का रुख देखकर मोर्चा के नेता हैरत में हैं। किसानों का पुराने राजनीतिक परिवेश में लौटना, मोर्चा के लिए किसी झटके से कम नहीं है। मोर्चा को आस है कि मालवा में किसान वोट बैंक उनके साथ जुडे़गा, लेकिन भाकियू उगराहां की जागरूक मुहिम का असर मोर्चा की आस पर ग्रहण लगाता प्रतीत हो रहा है। भारतीय किसान यूनियन एकता उगराहां के महासचिव दरबारा सिंह छाजला ने कहा कि आंदोलन के जरिये ही अधिकारों को हासिल किया जा सकता है। सियासी दलों ने तो किसानी की आड़ में सियासत की है और इसी वजह से किसान घोर संकट में हैं।

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