Punjab Elections: Political Party Of Farmer Organizations Can Cut Votes Of Other Parties, Farmers Protest At The Stake – पंजाब चुनाव: कहीं ‘वोट कटवा’ तो नहीं बन जाएंगे किसान संगठन? चुनावी दांव पर लग गया आंदोलन!

सार

किसान संगठनों द्वारा राजनीति में उतरने की घोषणा के बाद पंजाब के राजनीतिक दलों के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आई थीं। कांग्रेस, अकाली दल, आम आदमी पार्टी और भाजपा को किसानों का डर सताने लगा था। उन्हें लग रहा था कि किसान संगठन दस फीसदी मतों के साथ भी उनका खेल बिगाड़ सकते हैं। लेकिन चुनाव की घोषणा होने तक माहौल बदल चुका था…

पंजाब चुनाव: संयुक्त समाज मोर्चा
– फोटो : Agency (File Photo)

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पंजाब के किसान संगठनों द्वारा राजनीति में कदम रखना और अब चुनाव मैदान में उतरना, इसे जल्दबाजी वाला निर्णय बताया जा रहा है। ‘संयुक्त किसान मोर्चा’ ने चुनाव लड़ रहे पंजाब के किसान संगठनों से पहले ही दूरी बना रखी है। किसान संगठनों को सभी विधानसभा सीटों के लिए मजबूत चेहरे नहीं मिल पा रहे हैं। अभी तक किसान पार्टियों का किसी राजनीतिक दल के साथ चुनावी गठबंधन भी नहीं हो सका है। पंजाब के किसान संगठनों द्वारा गठित राजनीतिक दल ‘संयुक्त समाज मोर्चा’, का नेतृत्व बलबीर सिंह राजेवाल कर रहे हैं। भारतीय किसान यूनियन हरियाणा के अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढ़ूनी ‘संयुक्त संघर्ष पार्टी’ का बैनर लेकर चुनाव में कूदे हैं। इनके बीच टिकटों के बंटवारे को लेकर घमासान मचा है। जानकार बताते हैं, पंजाब के चुनावी अखाड़े में उतरे किसान संगठन ‘वोट कटवा’ का दाग लगवाने के जोखिम की ओर बढ़ रहे हैं। चुनाव में ‘किसान आंदोलन’ की सफलता दांव पर लगी है।

74 विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका में हैं किसान

पंजाब में किसान संगठनों ने सभी 117 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कही है। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले प्रदेश में लगभग 74 विधानसभा सीटों पर किसान निर्णायक भूमिका में बताए जाते हैं। मालवा क्षेत्र में किसानों का खासा प्रभाव रहा है। यहां की 69 सीटों पर सीधे तौर से किसान ही उम्मीदवार की जीत-हार का फैसला करते हैं। माझा क्षेत्र में 25 सीटें हैं। इसके बाद दोआबा का नंबर आता है। इस क्षेत्र में 23 सीटें शामिल हैं। माझा क्षेत्र की 25 सीटों पर सिख वोटरों का बाहुल्य है। चूंकि किसान संगठनों में अधिकांश सिख हैं, इसलिए वहां भी किसानों की बात को तव्वजो दी जाती है। किसान आंदोलन, उसके बाद मिली जीत और मौजूदा हालात, इन सब परिस्थितियों में किसान संगठनों की छवि में भी उतार चढ़ाव देखा गया है। किसान आंदोलन की जीत के बाद लग रहा था कि पंजाब में राजेवाल और उनके सहयोगी अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं। हालांकि उसी वक्त संयुक्त किसान मोर्चे ने खुद को चुनावी राजनीति से अलग कर लिया। साथ ही यह भी कहा कि एसकेएम, किसी भी संगठन के पक्ष में चुनाव प्रचार नहीं करेगा।

कांग्रेस, अकाली और भाजपा, सभी गठबंधन पर मौन

किसान संगठनों द्वारा राजनीति में उतरने की घोषणा के बाद पंजाब के राजनीतिक दलों के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आई थीं। कांग्रेस, अकाली दल, आम आदमी पार्टी और भाजपा को किसानों का डर सताने लगा था। उन्हें लग रहा था कि किसान संगठन दस फीसदी मतों के साथ भी उनका खेल बिगाड़ सकते हैं। चुनाव की घोषणा होने तक माहौल बदल चुका था। राजनीतिक दलों ने किसानों को लेकर सर्वे कराया। उसमें किसान संगठनों की भूमिका ज्यादा बड़ी नजर नहीं आई। किसान संगठनों को उम्मीद थी कि केजरीवाल की पार्टी के साथ वे कम से कम चालीस सीटों पर गठबंधन करेंगे, लेकिन बात नहीं बन सकी। केजरीवाल ने मुश्किल से डेढ़ दर्जन सीटें देने की बात कही। अभी कांग्रेस, अकाली और भाजपा, ये दल भी गठबंधन को लेकर मौन हैं। अब हालत यह हो गई है कि किसान संगठनों की पार्टियां ‘संयुक्त समाज मोर्चा’ और ‘संयुक्त संघर्ष पार्टी’ के बीच गठबंधन को लेकर दरार पड़ गई है। गुरनाम सिंह चढूनी कहते हैं, अगर संयुक्त समाज मोर्चा गुरुवार तक उनके दल को 25 सीटें नहीं देता है तो फिर वे अकेले ही चुनाव मैदान में उतरेंगे। संयुक्त समाज मोर्चे ने नौ सीटें ऑफर की हैं।

अब तो ‘किसान आंदोलन’ की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है.

कीर्ति किसान यूनियन की राज्य कमेटी के सदस्य रमिन्द्र सिंह बताते हैं, किसान संगठनों ने पंजाब की राजनीति में कदम रखने का निर्णय जल्दबाजी में लिया है। किसान आंदोलन की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। अगर इससे किसानों का भला होता है तो ‘संयुक्त किसान मोर्चा’ आज पंजाब चुनाव से दूरी नहीं बनाता। अभी किसान संगठनों को खुद के लिए जगह बनाने की जरुरत थी। किसानों की समस्याएं हल नहीं हुई हैं। सरकार ने तीन कृषि कानून वापस ले लिए, केवल यही हुआ है। किसान, जिन समस्याओं का सामना कर रहे थे, वे तो जस की तस हैं। चुनाव में किसान संगठनों के लिए ज्यादा संभावनाएं नजर नहीं आ रही। उनकी छवि को खतरा है। दाग लग सकता है। यूं कह सकते हैं कि किसान संगठनों ने चुनाव में एक जुआ खेला है। इन नेताओं को किसानों की मांग को लेकर अभी संघर्ष करना चाहिए था। एकाएक राजनीतिक में कदम रख कर मोर्चा बदल लेना ठीक नहीं। पहले खुद के मुद्दे उठाते, उन्हें राजनीतिक दलों के सामने रखते, मगर ऐसा कुछ नहीं हो सका।  

मौजूदा सीन तो ‘वोट कटवा’ जैसा

पंजाब के लोगों ने दशकों तक कांग्रेस और अकालियों का शासन देखा है। अब इन दोनों पार्टियों से लोगों का मन भर गया है। लोग कुछ नया चाह रहे हैं। अपनी इसी बात को आगे बढ़ाते हुए रमिंद्र सिंह कहते हैं, ऐसी पार्टी जो पंजाब के ताजा हालात समझकर आगे बढ़ने के लिए तैयार हो, उसे मौका मिल सकता है। किसान संगठन, अभी इस स्थिति में नहीं हैं। लोगों का थोड़ा झुकाव आप की ओर नजर आ रहा है। हालांकि लोग मन की बात नहीं रख रहे। राजनीतिक दल, मुद्दों पर कोई बात नहीं कर रहा। केवल

पंजाब की अर्थव्यवस्था कृषि पर टिकी है। इस पर कोई नहीं बोल रहा। हरित क्रांति का मॉडल कहां है। किसान मॉडल, कॉरपोरेट मॉडल पर कुछ तो बोलें। क्या सरकारी खरीद पर एमएसपी की सभी मांगें पूरी हो गई हैं, इस पर नहीं बोल रहे। पंजाब में जमीन की उपजाऊ शक्ति खत्म होती जा रही है। पानी नीचे जा रहा है। कल को क्या होगा, इसका अंदाजा है किसी को। उद्योग यहां की जरुरत है। सहकारी क्षेत्र का दायरा बढ़ता है तो अधिक रोजगार सृजन होगा। बेरोजगारों के पास काम नहीं है। बातों से पेट कैसे भरेगा। राजनीतिक दल चुप हैं। एसकेएम को भरोसा नहीं है। ऐसे में किसान संगठन वोट कटवा जैसा कोई दाग लगवा सकते हैं। किसान आंदोलन के दौरान देशभर में इन संगठनों की एक छवि बनी थी। अब उसका ग्राफ कम होता जा रहा है।

विस्तार

पंजाब के किसान संगठनों द्वारा राजनीति में कदम रखना और अब चुनाव मैदान में उतरना, इसे जल्दबाजी वाला निर्णय बताया जा रहा है। ‘संयुक्त किसान मोर्चा’ ने चुनाव लड़ रहे पंजाब के किसान संगठनों से पहले ही दूरी बना रखी है। किसान संगठनों को सभी विधानसभा सीटों के लिए मजबूत चेहरे नहीं मिल पा रहे हैं। अभी तक किसान पार्टियों का किसी राजनीतिक दल के साथ चुनावी गठबंधन भी नहीं हो सका है। पंजाब के किसान संगठनों द्वारा गठित राजनीतिक दल ‘संयुक्त समाज मोर्चा’, का नेतृत्व बलबीर सिंह राजेवाल कर रहे हैं। भारतीय किसान यूनियन हरियाणा के अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढ़ूनी ‘संयुक्त संघर्ष पार्टी’ का बैनर लेकर चुनाव में कूदे हैं। इनके बीच टिकटों के बंटवारे को लेकर घमासान मचा है। जानकार बताते हैं, पंजाब के चुनावी अखाड़े में उतरे किसान संगठन ‘वोट कटवा’ का दाग लगवाने के जोखिम की ओर बढ़ रहे हैं। चुनाव में ‘किसान आंदोलन’ की सफलता दांव पर लगी है।

74 विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका में हैं किसान

पंजाब में किसान संगठनों ने सभी 117 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कही है। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले प्रदेश में लगभग 74 विधानसभा सीटों पर किसान निर्णायक भूमिका में बताए जाते हैं। मालवा क्षेत्र में किसानों का खासा प्रभाव रहा है। यहां की 69 सीटों पर सीधे तौर से किसान ही उम्मीदवार की जीत-हार का फैसला करते हैं। माझा क्षेत्र में 25 सीटें हैं। इसके बाद दोआबा का नंबर आता है। इस क्षेत्र में 23 सीटें शामिल हैं। माझा क्षेत्र की 25 सीटों पर सिख वोटरों का बाहुल्य है। चूंकि किसान संगठनों में अधिकांश सिख हैं, इसलिए वहां भी किसानों की बात को तव्वजो दी जाती है। किसान आंदोलन, उसके बाद मिली जीत और मौजूदा हालात, इन सब परिस्थितियों में किसान संगठनों की छवि में भी उतार चढ़ाव देखा गया है। किसान आंदोलन की जीत के बाद लग रहा था कि पंजाब में राजेवाल और उनके सहयोगी अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं। हालांकि उसी वक्त संयुक्त किसान मोर्चे ने खुद को चुनावी राजनीति से अलग कर लिया। साथ ही यह भी कहा कि एसकेएम, किसी भी संगठन के पक्ष में चुनाव प्रचार नहीं करेगा।

कांग्रेस, अकाली और भाजपा, सभी गठबंधन पर मौन

किसान संगठनों द्वारा राजनीति में उतरने की घोषणा के बाद पंजाब के राजनीतिक दलों के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आई थीं। कांग्रेस, अकाली दल, आम आदमी पार्टी और भाजपा को किसानों का डर सताने लगा था। उन्हें लग रहा था कि किसान संगठन दस फीसदी मतों के साथ भी उनका खेल बिगाड़ सकते हैं। चुनाव की घोषणा होने तक माहौल बदल चुका था। राजनीतिक दलों ने किसानों को लेकर सर्वे कराया। उसमें किसान संगठनों की भूमिका ज्यादा बड़ी नजर नहीं आई। किसान संगठनों को उम्मीद थी कि केजरीवाल की पार्टी के साथ वे कम से कम चालीस सीटों पर गठबंधन करेंगे, लेकिन बात नहीं बन सकी। केजरीवाल ने मुश्किल से डेढ़ दर्जन सीटें देने की बात कही। अभी कांग्रेस, अकाली और भाजपा, ये दल भी गठबंधन को लेकर मौन हैं। अब हालत यह हो गई है कि किसान संगठनों की पार्टियां ‘संयुक्त समाज मोर्चा’ और ‘संयुक्त संघर्ष पार्टी’ के बीच गठबंधन को लेकर दरार पड़ गई है। गुरनाम सिंह चढूनी कहते हैं, अगर संयुक्त समाज मोर्चा गुरुवार तक उनके दल को 25 सीटें नहीं देता है तो फिर वे अकेले ही चुनाव मैदान में उतरेंगे। संयुक्त समाज मोर्चे ने नौ सीटें ऑफर की हैं।

अब तो ‘किसान आंदोलन’ की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है.

कीर्ति किसान यूनियन की राज्य कमेटी के सदस्य रमिन्द्र सिंह बताते हैं, किसान संगठनों ने पंजाब की राजनीति में कदम रखने का निर्णय जल्दबाजी में लिया है। किसान आंदोलन की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। अगर इससे किसानों का भला होता है तो ‘संयुक्त किसान मोर्चा’ आज पंजाब चुनाव से दूरी नहीं बनाता। अभी किसान संगठनों को खुद के लिए जगह बनाने की जरुरत थी। किसानों की समस्याएं हल नहीं हुई हैं। सरकार ने तीन कृषि कानून वापस ले लिए, केवल यही हुआ है। किसान, जिन समस्याओं का सामना कर रहे थे, वे तो जस की तस हैं। चुनाव में किसान संगठनों के लिए ज्यादा संभावनाएं नजर नहीं आ रही। उनकी छवि को खतरा है। दाग लग सकता है। यूं कह सकते हैं कि किसान संगठनों ने चुनाव में एक जुआ खेला है। इन नेताओं को किसानों की मांग को लेकर अभी संघर्ष करना चाहिए था। एकाएक राजनीतिक में कदम रख कर मोर्चा बदल लेना ठीक नहीं। पहले खुद के मुद्दे उठाते, उन्हें राजनीतिक दलों के सामने रखते, मगर ऐसा कुछ नहीं हो सका।  

मौजूदा सीन तो ‘वोट कटवा’ जैसा

पंजाब के लोगों ने दशकों तक कांग्रेस और अकालियों का शासन देखा है। अब इन दोनों पार्टियों से लोगों का मन भर गया है। लोग कुछ नया चाह रहे हैं। अपनी इसी बात को आगे बढ़ाते हुए रमिंद्र सिंह कहते हैं, ऐसी पार्टी जो पंजाब के ताजा हालात समझकर आगे बढ़ने के लिए तैयार हो, उसे मौका मिल सकता है। किसान संगठन, अभी इस स्थिति में नहीं हैं। लोगों का थोड़ा झुकाव आप की ओर नजर आ रहा है। हालांकि लोग मन की बात नहीं रख रहे। राजनीतिक दल, मुद्दों पर कोई बात नहीं कर रहा। केवल

पंजाब की अर्थव्यवस्था कृषि पर टिकी है। इस पर कोई नहीं बोल रहा। हरित क्रांति का मॉडल कहां है। किसान मॉडल, कॉरपोरेट मॉडल पर कुछ तो बोलें। क्या सरकारी खरीद पर एमएसपी की सभी मांगें पूरी हो गई हैं, इस पर नहीं बोल रहे। पंजाब में जमीन की उपजाऊ शक्ति खत्म होती जा रही है। पानी नीचे जा रहा है। कल को क्या होगा, इसका अंदाजा है किसी को। उद्योग यहां की जरुरत है। सहकारी क्षेत्र का दायरा बढ़ता है तो अधिक रोजगार सृजन होगा। बेरोजगारों के पास काम नहीं है। बातों से पेट कैसे भरेगा। राजनीतिक दल चुप हैं। एसकेएम को भरोसा नहीं है। ऐसे में किसान संगठन वोट कटवा जैसा कोई दाग लगवा सकते हैं। किसान आंदोलन के दौरान देशभर में इन संगठनों की एक छवि बनी थी। अब उसका ग्राफ कम होता जा रहा है।

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